Wednesday, 2 October 2013

घर की इज्जत



घर की इज्जत

कैसे महफूज़ रखूँ
अपने घर की इज्ज़त
हर तरफ वहशी दरिंदो का साया हैं
रखते हैं गढ़ाये हरवक्त
गिद्ध सी नज़रे
मेरे घर आँगन में
जैसे बोटी नोचने का उन्हें
निमंत्रण भिजवाया हैं
ताक पर रख दी इंसानियत
हैवानियत का मंज़र
उनकी आँखों में नज़र आया हैं
घर से निकलना
दूभर हो गया बेटियों का
हर माता-पिता सोचे
ये नराधम किस कोख का जाया हैं
क्यूँ बदल गयी सोच
आज के नौजवानों की
क्या हवस को ही
उन्होंने अपना मकसद बनाया हैं
चिंतित हैं हर घर आँगन
ऐसा बबुल का पेड़ कहीं
मेरे घर आँगन तो नहीं उग आया हैं

जीतेन्द्र सिंह "नील"
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