Friday, 8 March 2013

परिकल्पना

परिकल्पना


चाहत से अंजान  हैं वो मेरी

गीत ग़ज़ल कविता में मेरी
उनका ही नाम आता हैं
पढ़ती हैं वह जब रचना मेरी
वाह वाह कर खूब दाद दे जाती हैं

चेहरा मेरा शर्म से लाल हुआ जाता हैं
कौन हैं वह खुशनसीब, पूछकर चली जाती हैं

उसकी आँखों में जाने क्या कशिश हैं
दिल में प्यार का अहसास कराती हैं
जब भी होता हैं उससे सामना मेरा
वह नज़ारे झुकाकर चली जाती हैं

उसकी बातो में मेरा जिक्र होता हैं
तन्हाई में नाम मेरा गुनगुनाती हैं
मेरे खयालो में खोई-खोई रहती हैं
प्यार का इज़हार करने से कतराती हैं

मीठी हैं बोली उसकी जैसे मिश्री की डली
बातो से मुझे अपना बना जाती हैं

शर्म हया लाज़ उसके गहने हैं
भीड़ में भी शालीन नज़र आती हैं
सह्रदयता पहचान हैं हैं उसकी
यही अदा मुझे उसका दीवाना बना जाती हैं

"नील"
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