Wednesday, 4 December 2013

परछाई



परछाई 

आज मुद्दतो बाद 
मुझसे मेरी परछाई मिली 
कुछ सोच में डूबी 
कुछ घबराई सी 
अपने अतीत को 
मुझसे छुपाती हुई 
कुछ कहने की कोशिश कर रही थी 
कहती भी कैसे वह 
शब्द नहीं थे उसके पास
परछाई थी ना वह 
अपने हाव भाव से 
अपने मन की व्यथा 
मुझसे कहने लगी 
वह नादान
इतना भी नहीं जानती कि
वह मेरी परछाई हैं
उसका दुःख दर्द मेरा ही तो हैं 
वह अंधेरो में छुपकर 
यही सोचती रहती हैं
मुझसे अपने दिल के राज 
छुपाकर रख लेगी 
क्या यह संभव हैं मैंने उससे पूछा 
दिन के उजाले में तो उसे 
सबके सामने आना ही होगा 
तब क्या होगा 
कैसे करेगी जग का सामना 
यही सोचकर वह 
फिर गुमनामी के अंधेरो में खो गई | 

जीतेन्द्र सिंह "नील"
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