Thursday, 5 December 2013

जूठन की दावत



जूठन की दावत

बहुत दिनों बाद
आज मेरे लिए थी दावत
किसी ने जूठन में
बहुत सा खाना फिकवाया
मैं भी बावला
खाने की चाह में
नंगे पाँव फटे कपड़ो में ही
दौड़ा चला आया
बहुत दिनों से
भूख थी अतृप्त
देख इतना खाना एक साथ
हो गयी संतृप्त
बिना एक पल गँवाए मैंने
खाने पर अपना अधिकार जमाया
क्या होती हैं भूख
तुम क्या जानो
फटेहाल जिंदगी को मैंने
अपने पागलपन से छिपाया
आज इतना खाना देख
रह नही पाया
भूल गया सब जिंदगी के दुःख
जब सामने खाना आया
किसका शुक्रियाँ करूँ
उस रब का
जिसके कारण ऐसा जीवन मिला
या उस मेहरबान का
जिसके कारण आज
भरपेट खाना मिला |

जीतेन्द्र सिंह "नील"
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